Explainer: NDA के पास बहुमत नहीं, फिर भी पास हो जाएगा महिला आरक्षण बिल? सरकार के पास हैं ये दो रास्ते

Women Reservation Bill 2026 Explainer: सरकार ने लोकसभा में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़ा बिल तो पेश कर दिया है, लेकिन उसके पास इसे अकेले पास कराने के लिए जरूरी बहुमत नहीं है। ऐसे में यह बिल कैसे पास होगा? आइए समझते हैं संसदीय गणित और वो दो रास्ते, जिनसे सरकार इस बड़ी चुनौती को पार कर सकती है।

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Rajasthan Desk - News
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Women Reservation Bill 2026 Explainer: सरकार ने महिला आरक्षण को 2029 से लागू करने के लिए लोकसभा में जो बिल पेश किया है, उस पर भारी राजनीतिक घमासान मचा हुआ है। लगभग सभी पार्टियां महिला आरक्षण के पक्ष में हैं, लेकिन परिसीमन के मुद्दे पर विपक्ष सरकार के खिलाफ एकजुट खड़ा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार के पास अकेले इस बिल को पास कराने के लिए जरूरी आंकड़ा ही नहीं है, तो फिर यह कानून कैसे बनेगा?

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इस पूरे संसदीय गणित को समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि यह कोई साधारण कानून नहीं है।

यह है एक ‘संविधान संशोधन विधेयक’

जब भी सरकार देश के संविधान में कोई बड़ा बदलाव करना चाहती है, तो उसे ‘संविधान संशोधन विधेयक’ लाना पड़ता है। यह कानून की किताब में एक नया पन्ना जोड़ने जैसा नहीं, बल्कि किताब के मूल ढांचे में बदलाव करने जैसा है। इसलिए इसे पास कराने के नियम बहुत सख्त होते हैं। इसे पास कराने के लिए दो शर्तें एक साथ पूरी करनी होती हैं:

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  • सदन की कुल संख्या का बहुमत: लोकसभा की कुल सदस्य संख्या (543) का बहुमत, यानी कम से-कम 272 वोट पक्ष में होने चाहिए।
  • मौजूद और वोट देने वालों का दो-तिहाई बहुमत: जिस दिन वोटिंग हो, उस दिन सदन में मौजूद और वोट देने वाले सांसदों में से कम से कम दो-तिहाई सांसद बिल के पक्ष में वोट करें।

लोकसभा का नंबर गेम: किसके पास कितने वोट?

  • जादुई आंकड़ा: अगर सभी 543 सांसद वोटिंग में हिस्सा लेते हैं, तो सरकार को बिल पास कराने के लिए लगभग 362 वोटों की जरूरत होगी।
  • NDA का आंकड़ा: एनडीए के पास सहयोगियों को मिलाकर करीब 300 सांसद हैं।
  • विपक्ष का आंकड़ा: इंडिया गठबंधन और अन्य विपक्षी दलों को मिलाकर यह संख्या 240 के करीब है।

साफ है कि एनडीए अकेले इस बिल को पास नहीं करा सकता। उसे विपक्ष के समर्थन की जरूरत होगी, जो फिलहाल मिलता नहीं दिख रहा।

तो फिर क्या हैं पास होने के रास्ते?

सरकार के पास इस मुश्किल को पार करने के दो मुख्य रास्ते हैं, और यहीं पर असली राजनीतिक रणनीति काम करती है।

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रास्ता नंबर 1: विपक्ष में सेंधमारी

सरकार की कोशिश होगी कि वह विपक्ष के कुछ दलों को अपने पाले में कर ले। सरकार इसे ‘नारी सम्मान’ और ‘राष्ट्रीय महत्व’ का मुद्दा बताकर कुछ क्षेत्रीय दलों पर दबाव बना सकती है। अगर विपक्ष के 60-70 सांसद भी सरकार के पक्ष में वोट कर देते हैं, तो बिल पास हो जाएगा। हालांकि, परिसीमन पर दक्षिण भारत के दलों के कड़े रुख को देखते हुए यह रास्ता बेहद मुश्किल है।

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रास्ता नंबर 2: ‘एब्सटेन’ का खेल (The Abstention Game)

यह सरकार के लिए सबसे आसान और संभावित रास्ता हो सकता है। ‘एब्सटेन’ का मतलब है कि सदन में मौजूद तो रहना, लेकिन वोटिंग में हिस्सा न लेना। कई बार विपक्षी दल विरोध जताने के लिए वोटिंग का बहिष्कार कर देते हैं या वॉकआउट कर जाते हैं।

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कैसे काम करता है यह गणित?

  • मान लीजिए, वोटिंग के दिन कांग्रेस और डीएमके समेत 140 विपक्षी सांसद विरोध में वॉकआउट कर जाते हैं।
  • अब सदन में वोट देने वाले सांसदों की संख्या बची: 543 – 140 = 403
  • अब बिल पास करने के लिए दो-तिहाई बहुमत 403 सांसदों का गिना जाएगा, जो होता है करीब 269।
  • एनडीए के पास करीब 300 सांसद हैं, जो इस आंकड़े से कहीं ज्यादा है।

इस तरह, विपक्ष बिना सरकार के पक्ष में वोट दिए भी बिल को पास होने में मदद कर सकता है। इससे विपक्ष यह भी कह पाएगा कि हमने बिल का समर्थन नहीं किया, और सरकार का काम भी बन जाएगा।

आगे क्या?

सरकार ने तीन लाइन का व्हिप जारी कर अपने सभी सांसदों को सदन में मौजूद रहने को कहा है। वहीं विपक्ष भी लगातार बैठकें कर अपनी रणनीति बना रहा है। अगले दो दिन यह तय करेंगे कि सरकार विपक्ष में सेंध लगा पाती है या फिर विपक्ष ‘एब्सटेन’ का रास्ता अपनाकर सरकार को निकलने का मौका देता है। अगर बिल लोकसभा से पास हो भी गया, तो उसे राज्यसभा में भी इसी तरह की दो-तिहाई बहुमत की चुनौती का सामना करना पड़ेगा।

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