Asmita De Commonwealth Games: साइकिल मैकेनिक की बेटी ने जूडो में रचा इतिहास, भारत को दिलाया पहला गोल्ड मेडल

Asmita De Commonwealth Games: जूडो में गोल्ड जीतकर अस्मिता डे ने रचा इतिहास, साइकिल मैकेनिक की बेटी ने 2026 खेलों में भारत का मान बढ़ाया।

Rupali kumawat
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Rupali kumawat - Sub Editor
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Asmita De Commonwealth Games:

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कनाडा की हेइडी क्वाच को धूल चटाकर त्रिपुरा की एक 23 वर्षीय बेटी ने वो कर दिखाया है, जो भारतीय खेल इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के जूडो रिंग में अस्मिता डे ने 2-1 से फाइनल मुकाबला जीतकर न केवल स्वर्ण पदक अपने नाम किया, बल्कि वह इस खेल में भारत के लिए गोल्ड जीतने वाली पहली खिलाड़ी भी बन गई हैं। जूडो के मैदान पर 31 जुलाई का दिन सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया, जब त्रिपुरा के बेलोनिया जैसे छोटे इलाके से निकली इस एथलीट ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा लहराया। अस्मिता की यह जीत सिर्फ एक मेडल नहीं है, बल्कि उन तमाम बाधाओं पर विजय है जो एक साधारण परिवार की लड़की के सामने अक्सर दीवार बनकर खड़ी हो जाती हैं।

कैसे एक धावक बनी जूडो की चैंपियन?

अस्मिता डे का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम रोमांचक नहीं है। आज भले ही पूरी दुनिया उनके जूडो दांव-पेंच की कायल हो, लेकिन उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एथलेटिक्स में 800 मीटर की दौड़ से की थी। खेलों के प्रति उनकी दीवानगी उन्हें साल 2015 में त्रिपुरा स्पोर्ट्स स्कूल ले आई, जहां उन्होंने जूडो की बारीकियां सीखना शुरू किया। उनकी प्रतिभा को देखते हुए जल्द ही उन्हें भारतीय खेल प्राधिकरण यानी साई के भोपाल सेंटर में ट्रेनिंग का मौका मिला। 48 किलोग्राम भार वर्ग में अपनी जगह पक्की करने वाली अस्मिता ने एशियन ओपन और जूनियर एशिया कप जैसी प्रतियोगिताओं में भी अपनी चमक बिखेरी है। उनकी तकनीक और गजब के आत्मविश्वास ने ही उन्हें आज ग्लासगो के पोडियम पर खड़ा किया है।

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क्या पिता के संघर्ष ने दी जीत को उड़ान?

इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे अस्मिता के पिता का कड़ा संघर्ष छिपा है, जो पेशे से एक साइकिल मैकेनिक हैं। घर की माली हालत ठीक न होने के बावजूद उन्होंने कभी अपनी बेटी के सपनों के बीच गरीबी को नहीं आने दिया। सीमित संसाधनों के बीच पलकर बड़ी हुई अस्मिता ने अपनी मेहनत से किस्मत की लकीरें बदल दी हैं। दिलचस्प बात यह रही कि ग्लासगो में खेले गए इन मुकाबलों में भारत को 15 मिनट के भीतर दोहरी खुशी मिली। अस्मिता के स्वर्ण पदक जीतने के कुछ ही देर बाद पुरुष वर्ग में हर्ष सिंह ने भी सोना जीतकर जश्न को दोगुना कर दिया। त्रिपुरा के एक छोटे से घर से शुरू हुआ यह सफर अब देश के हर उभरते हुए खिलाड़ी के लिए प्रेरणा बन चुका है।

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रुपाली कुमावत पिछले कई वर्षों से लेखन क्षेत्र में कार्यरत हैं। उनको हिंदी कविताएं, कहानियां लिखने के अलावा ब्रेकिंग, लेटेस्ट व ट्रेंडिंग न्यूज स्टोरी कवर करने में रुचि हैं। उन्होंने राजस्थान यूनिवर्सिटी से BADM में M.Com किया हैं एवं पंडित दीनदयाल शेखावाटी यूनिवर्सिटी से family law में LL.M किया हैं। रुपाली कुमावत के लेख Focus her life, (राजस्थान पत्रिका), सीकर पत्रिका, https://foucs24news.com, खबर लाइव पटना जैसे मीडिया संस्थानों में छप चुके हैं। फिलहाल रुपाली कुमावत 89.6 एफएम सीकर में बतौर न्यूज कंटेंट राइटर अपनी सेवाएं दे रही हैं।
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