Rajasthan Tradition: राजस्थान के सीकर जिले के रींगस कस्बे में होली के जश्न का एक अनोखा तरीका अपनाया जाता है, जो शायद ही कहीं और देखने को मिले। रींगस कस्बा, होली के रंगों में सराबोर, एक अनोखी परंपरा का गवाह बनता है। धुलंडी के दिन, यहां एक तरफ मुर्दे की अर्थी निकलती है और उसके ठीक पीछे दूल्हे की बारात चलती है। यह अनूठी परंपरा न केवल मनोरंजन का साधन है बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक भी है। यह आयोजन इस समुदाय की जीवंतता और एकजुटता का परिचय देता है।
होली का अनोखा स्वागत
धुलंडी के दिन सुबह 8 बजे से ही रींगस कस्बे का मुख्य चौराहा, गोपीनाथ राजा मंदिर के सामने, उल्लास से भर जाता है। श्री सूर्य मंडल समाज सेवा समिति द्वारा आयोजित भजनों के कार्यक्रम में स्थानीय लोग और श्रद्धालु शामिल होते हैं। पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष कैलाश पारीक द्वारा शुरू की गई चाय-पकौड़ी की सेवा आज भी जारी है, जहां लोग निशुल्क नाश्ते का आनंद लेते हैं। रंगों और धुनों के साथ, युवा होली के रंग में पूरी तरह सराबोर हो जाते हैं।
अर्थी और बारात का अनोखा संगम
दोपहर 1:30 बजे तक रंगों का खेल थम जाता है और तैयारी होती है एक विशेष यात्रा की। एक युवक को दूल्हे का रूप देकर ऊंट या घोड़े पर बिठाया जाता है, जबकि दूसरी ओर, एक अर्थी हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार तैयार की जाती है। इस यात्रा में शामिल लोग समाज की बुराइयों के अंत का संकेत देते हुए मातम मनाते हैं। वहीं, बारात में शामिल लोग नाचते-गाते चलते हैं, जो आने वाले वर्ष की खुशियों का प्रतीक होता है।
श्मशान घाट पर समापन
यह यात्रा श्मशान घाट तक जाती है जहां अर्थी का प्रतीकात्मक दाह संस्कार होता है। इसके बाद भक्त प्रहलाद की आरती की जाती है और सभी लोग एक-दूसरे को गले लगाकर होली की विदाई देते हैं। लोगों का मानना है कि यह परंपरा न केवल उत्सव है बल्कि समाज के लिए एक सीख भी है।
Want a Website like this?
Designed & Optimized by Naveen Parmuwal
Journalist | SEO | WordPress Expert





