Mahashivratri 2026: हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का पर्व शिव और शक्ति के पुनर्मिलन का प्रतीक है, जो विश्वभर के श्रद्धालुओं के बीच आस्था का केंद्र बना हुआ है। यह पर्व देवों के देव महादेव और देवी पार्वती के शुभ विवाह का स्मरण कराता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन महादेव ने माता पार्वती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था, जो त्याग और निष्ठा का अद्वितीय उदाहरण है। जानिए इस अद्भुत मिलन की पौराणिक कथा और कैसे देवी पार्वती ने कठिन तप से शिव को प्राप्त किया।
शिव के बिना अधूरी थी शक्ति, जानें कैसे पूरा हुआ मिलन
शिव और शक्ति के मिलन की कथाएं अनंत काल से चली आ रही हैं। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, देवी सती अपने पिता दक्ष के अपमान से व्यथित होकर यज्ञ अग्नि में समर्पित हो गईं, जिससे शिव ध्यानस्थ होकर हिमालय में तपस्या करने लगे। इसी बीच, देवी सती ने पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया और महादेव को पाने के लिए कठिन तप का संकल्प लिया। उनकी निष्ठा और प्रेम ने अंततः शिव को जागृत किया।
देवी पार्वती की कठिन तपस्या ने जगाया महादेव को
पार्वती जी के तप की कथा अत्यंत प्रेरणादायक है। उन्होंने सुख-सुविधाओं का त्याग कर हिमालय में घोर तप किया। वर्षों तक केवल फल-फूल और बाद में जल का सेवन कर तपस्या की, जिसने शिव को अंततः समाधि से उठाया। पार्वती जी के इस अभूतपूर्व तप ने उन्हें ‘अपर्णा’ नाम से प्रसिद्ध किया। शिव ने पार्वती का प्रेम और समर्पण देखकर उन्हें अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया।
शिव-पार्वती का अनोखा विवाह: देवताओं की अद्भुत बारात
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन महादेव अद्वितीय बारात लेकर देवी पार्वती के द्वार पर आए। इस बारात में देवता, गंधर्व, भूत-प्रेत और नंदी सम्मिलित थे। यह अद्वितीय विवाह उत्सव श्रद्धा और आस्था का प्रतीक है, जो आज भी महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। इस साल यह पर्व 15 फरवरी को मनाया जाएगा।
इस कथा के माध्यम से हमें सिखाई जाती है सच्चे प्रेम और निष्ठा की शक्ति। हालांकि, पाठकों से अनुरोध है कि वे इन पौराणिक कथाओं को आस्था का एक रूप मानें और अपने विवेक से काम लें।
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