Celina Jaitly:
भारतीय त्योहारों पर फिल्मी सितारों का पहनावा अक्सर चर्चा का विषय बनता है, लेकिन इस बार रक्षाबंधन के मौके पर अभिनेत्री सेलिना जेटली का अंदाज इंटरनेट यूजर्स को बिलकुल पसंद नहीं आया। मुंबई में आयोजित एक समारोह में सेलिना लाल रंग की साड़ी और डीप नेक ब्लाउज पहनकर पहुंची थीं, जिसके बाद सोशल मीडिया पर उनकी आलोचनाओं का सैलाब आ गया है। लोग उनकी खूबसूरती की तारीफ करने के बजाय उनके कपड़ों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। कई यूजर्स का कहना है कि पारंपरिक त्योहारों के दौरान शालीनता का ध्यान रखना जरूरी है और इस तरह के आधुनिक परिधान हमारी संस्कृति और परंपराओं के साथ मेल नहीं खाते। सोशल मीडिया पर एक वर्ग का मानना है कि पवित्र त्योहारों की मर्यादा बनाए रखने के लिए सेलिब्रिटीज को अपने फैशन सेंस पर गौर करना चाहिए।
क्या त्योहारों की पवित्रता को भूल रहा है बॉलीवुड?
सोशल मीडिया पर सेलिना जेटली को लेकर चल रही इस बहस ने एक बार फिर पुरानी यादें ताजा कर दी हैं। ट्रोल करने वाले लोगों ने सेलिना के लुक में बिंदी, सिंदूर और चूड़ियों की कमी को भी मुद्दा बनाया है। यूजर्स का कहना है कि केवल साड़ी पहन लेने से कोई लुक पारंपरिक नहीं हो जाता, बल्कि त्योहार के हिसाब से श्रृंगार और मर्यादा भी जरूरी है। अगस्त 28, 2026 की इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि नेटिजन्स अब सितारों के वेस्टर्न या जरूरत से ज्यादा बोल्ड फैशन को त्योहारों के मौके पर स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं। लोगों की नाराजगी इस बात को लेकर है कि बॉलीवुड हस्तियां अक्सर त्योहारों को एक फैशन शो की तरह पेश करती हैं, जिससे उत्सव की असल भावना कहीं पीछे छूट जाती है।
कृति सैनन के पुराने विवाद से क्या है इसका नाता?
सेलिना जेटली का यह मामला ठीक वैसा ही है जैसा कुछ समय पहले अभिनेत्री कृति सैनन के साथ हुआ था। कृति ने एक आभूषण ब्रांड के विज्ञापन में रक्षाबंधन के मौके पर डीप नेक ब्रालेट ब्लाउज पहना था, जिस पर कंगना रनौत समेत कई बड़ी हस्तियों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। उस समय कृति ने महिलाओं के कपड़ों पर रोक टोक को लेकर अपना पक्ष मजबूती से रखा था, लेकिन भारी विरोध और ग्राहकों के दबाव के कारण उस ज्वेलरी ब्रांड को वह कमर्शियल विज्ञापन अपने प्लेटफॉर्म से हटाना पड़ा था। ब्रांड ने विवाद बढ़ता देख आधिकारिक बयान जारी कर विज्ञापन वापस लेने का फैसला किया था। अब सेलिना का ताजा विवाद यह दर्शाता है कि फैशन और पारंपरिक मूल्यों के बीच की यह जंग फिलहाल थमने वाली नहीं है।
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