Sanjay Mishra National Award: ढाबे पर बर्तन धोने से लेकर नेशनल अवॉर्ड तक, संजय मिश्रा का फिल्मी सफरनामा

Sanjay Mishra National Award: जानिए कैसे ऋषिकेश के ढाबे पर बर्तन धोने वाले संजय मिश्रा ने साल 2026 में फिल्म भक्षक के लिए जीता अपना पहला नेशनल अवॉर्ड।

Rupali kumawat
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Rupali kumawat - Sub Editor
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Sanjay Mishra National Award: सिनेमा की चकाचौंध से दूर ऋषिकेश की वादियों में एक शख्स बर्तन धो रहा था और आमलेट बना रहा था, जिसे दुनिया आज बेहतरीन अभिनेता संजय मिश्रा के नाम से जानती है। सालों की मेहनत और निजी जिंदगी के उतार चढाव के बाद आखिरकार उनकी प्रतिभा को सबसे बड़ा सम्मान मिल गया है। साल 2026 में घोषित हुए 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में संजय मिश्रा को फिल्म भक्षक के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के खिताब से नवाजा गया है। यह अवॉर्ड उनके उस लंबे संघर्ष का परिणाम है जिसमें एक समय ऐसा भी था जब उन्होंने अभिनय की दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। फिल्म भक्षक में उनके द्वारा निभाए गए भास्कर सिन्हा के दमदार किरदार ने जूरी और दर्शकों दोनों का दिल जीत लिया, जिसके बाद आधिकारिक विजेताओं की सूची में उनका नाम शान से दर्ज हुआ।

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आखिर क्यों एक चमकता सितारा बर्तन धोने पर मजबूर हुआ?

सत्तर और अस्सी के दशक के बाद हिंदी सिनेमा में अपनी पहचान बनाने वाले संजय मिश्रा की जिंदगी में एक ऐसा काला दौर आया जिसने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया था। एक गंभीर बीमारी की वजह से उनके पिता का निधन हो गया और इस सदमे ने उन्हें इतना विचलित किया कि उन्होंने मायानगरी छोड़ने का फैसला कर लिया। शांति की तलाश में वह ऋषिकेश चले गए और वहां गंगा किनारे एक छोटे से ढाबे पर काम करने लगे। उस दौर में वह प्रतिदिन करीब 50 कप धोते थे जिसके बदले उन्हें महज 150 रुपये मिलते थे। हैरानी की बात यह है कि वहां आने वाले सैलानी उन्हें पहचान लेते थे, लेकिन वह अपनी धुन में मगन जीवन की नई परिभाषा खोज रहे थे। वह दौर उनके लिए किसी परीक्षा से कम नहीं था, जहां एक तरफ फिल्मी दुनिया की चमक थी और दूसरी तरफ असल जिंदगी की कड़वी सच्चाई।

रोहित शेट्टी के एक फोन ने कैसे बदली किस्मत?

जब संजय मिश्रा ऋषिकेश के उस ढाबे पर अपनी जिंदगी काट रहे थे, तभी निर्देशक रोहित शेट्टी का एक फोन कॉल उनके पास आया। रोहित ने उन्हें फिल्म ऑल द बेस्ट में काम करने का प्रस्ताव दिया। यह केवल एक फिल्म का ऑफर नहीं था, बल्कि उनके डूबते करियर के लिए एक संजीवनी जैसा था। इसी फोन कॉल के बाद संजय ने दोबारा कैमरे का सामना करने का साहस जुटाया और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद उन्होंने गोलमाल, ऑफिस ऑफिस और आंखों देखी जैसी फिल्मों से अपनी बहुमुखी प्रतिभा का लोहा मनवाया। कॉमेडी हो या गंभीर भूमिका, संजय मिश्रा ने हर किरदार में जान फूंकी है। भक्षक के लिए मिला यह नेशनल अवॉर्ड उनकी सादगी और कड़ी मेहनत का सबसे बड़ा ईनाम है, जिसके लिए उन्होंने पूरी टीम का आभार जताया है।

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रुपाली कुमावत पिछले कई वर्षों से लेखन क्षेत्र में कार्यरत हैं। उनको हिंदी कविताएं, कहानियां लिखने के अलावा ब्रेकिंग, लेटेस्ट व ट्रेंडिंग न्यूज स्टोरी कवर करने में रुचि हैं। उन्होंने राजस्थान यूनिवर्सिटी से BADM में M.Com किया हैं एवं पंडित दीनदयाल शेखावाटी यूनिवर्सिटी से family law में LL.M किया हैं। रुपाली कुमावत के लेख Focus her life, (राजस्थान पत्रिका), सीकर पत्रिका, https://foucs24news.com, खबर लाइव पटना जैसे मीडिया संस्थानों में छप चुके हैं। फिलहाल रुपाली कुमावत 89.6 एफएम सीकर में बतौर न्यूज कंटेंट राइटर अपनी सेवाएं दे रही हैं।
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