Venugopal Dhoot: भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स जगत का बड़ा नाम रहे वीडियोकॉन समूह के पूर्व प्रमोटर वेणुगोपाल धूत की मुश्किलें अब चरम पर पहुंच गई हैं। मुंबई स्थित नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल यानी एनसीएलटी ने 5 नवंबर 2026 को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए उन्हें दिवालिया घोषित कर दिया है। यह कार्रवाई भारतीय स्टेट बैंक की उस अर्जी पर हुई है, जिसमें धूत द्वारा दिए गए कर्ज चुकाने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया गया था। उन पर करीब 12,668 करोड़ रुपये का भारी भरकम बकाया है, जिसे चुकाने में वे नाकाम रहे।
धूत के 600 करोड़ रुपये के प्रस्ताव को क्यों नकारा गया?
वेणुगोपाल धूत ने बैंकों के सामने 36 महीनों के भीतर 600 करोड़ रुपये चुकाने की एक योजना रखी थी। उन्होंने दावा किया था कि पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में एक रियल एस्टेट प्रोजेक्ट से आने वाले पैसे से वह यह भुगतान करेंगे। हालांकि, कर्ज देने वाले बैंक इस प्रस्ताव से सहमत नहीं हुए। इसके पीछे मुख्य वजह यह थी कि यह पैसा भविष्य के प्रोजेक्ट और उसकी सरकारी मंजूरियों पर टिका था, जिसमें जोखिम बहुत ज्यादा था। बैंकों को तत्काल भुगतान का कोई ठोस रास्ता नजर नहीं आया, जिसके बाद एसबीआई ने उन्हें दिवालिया घोषित करने की मांग की।
कैसे एक सफल कारोबारी निजी दिवालियापन की दहलीज तक पहुंचा?
वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज कभी शेयर बाजार की दिग्गज कंपनी हुआ करती थी, लेकिन कर्ज के जाल ने सब कुछ बदल दिया। इस पूरे मामले के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- साल 2008 में वीडियोकॉन की बाजार वैल्यू लगभग 20 हजार करोड़ रुपये के करीब थी।
- कंपनी के एक शेयर की कीमत 868.65 रुपये के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई थी।
- वेणुगोपाल धूत ने कंपनी के लिए लिए गए कर्ज पर अपनी व्यक्तिगत गारंटी दी थी, जिसके कारण अब उनकी निजी संपत्ति पर आंच आई है।
- एसबीआई ने साल 2018 में सबसे पहले कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू की थी।
- अदालत ने अब असीष नारायण को दिवालिया ट्रस्टी नियुक्त किया है, जो धूत की संपत्तियों का हिसाब लेंगे।
अब धूत की संपत्तियों का क्या होगा?
एनसीएलटी के आदेश के बाद अब वेणुगोपाल धूत को एक हफ्ते के भीतर अपनी पूरी चल और अचल संपत्ति का ब्यौरा सरकारी ट्रस्टी को सौंपना होगा। अब उनकी संपत्तियों पर उनका अपना नियंत्रण नहीं रहेगा, बल्कि ट्रस्टी इन संपत्तियों का प्रबंधन करेगा। इन संपत्तियों को बेचकर या अन्य कानूनी तरीकों से बैंकों का बकाया वसूलने की कोशिश की जाएगी। यह पाबंदी तब तक लागू रहेगी जब तक कि कानून के तहत उन्हें इस मामले से डिस्चार्ज नहीं मिल जाता। यह मामला कॉर्पोरेट जगत के लिए एक बड़ा सबक है कि कैसे व्यक्तिगत गारंटी किसी बड़े बिजनेसमैन के लिए भारी पड़ सकती है।
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