Daayra Movie Review: जब कानून के रखवाले ही खुद जज और जल्लाद बन जाएं, तो क्या उसे इंसाफ माना जाना चाहिए? मेघना गुलजार की नई फिल्म इसी चुभते हुए सवाल के इर्द-गिर्द घूमती है। कहानी की शुरुआत एक दिल दहला देने वाली घटना से होती है, जहां एक युवती के साथ गैंगरेप और हत्या के आरोपियों को पुलिस एक एनकाउंटर में ढेर कर देती है। जनता इसे तुरंत मिला न्याय मानकर जश्न मनाती है, लेकिन क्या यह सच में इंसाफ है या फिर वर्दी की आड़ में की गई कोई बड़ी साजिश? फिल्म इसी पहेली को सुलझाने की कोशिश करती है। इसमें करीना कपूर खान डीसीपी अजोनी कोहली के किरदार में एसआईटी की कमान संभाल रही हैं, जिन्हें इस एनकाउंटर की सच्चाई का पता लगाना है। उनके सामने खड़े हैं डीसीपी रमन कुमार यानी पृथ्वीराज सुकुमारन, जिन्होंने इस पूरी कार्रवाई को अंजाम दिया है।
क्या पुलिस को कानून हाथ में लेने का हक है?
फिल्म का असली रोमांच तब शुरू होता है जब अजोनी की जांच पुलिस की आधिकारिक थ्योरी की धज्जियां उड़ाने लगती है। एक तरफ रमन है जो मानता है कि अपराधियों को उनके किए की सजा तुरंत मिलनी चाहिए ताकि पीड़ित परिवार को सुकून मिले, वहीं अजोनी का मानना है कि वर्दी की ताकत कानून के दायरे से बाहर नहीं जानी चाहिए। यह टकराव फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा है। मेघना गुलजार ने बड़ी ही बारीकी से दिखाया है कि कैसे समाज और सिस्टम के बीच न्याय की परिभाषा बदल जाती है। हालांकि स्क्रीनप्ले में करीना के पक्ष को उतना भावनात्मक वजन नहीं मिल पाया जितना पृथ्वीराज के गुस्से और उनकी सोच को दिया गया है। फिल्म यह फैसला दर्शकों पर छोड़ देती है कि क्या न्याय के लिए शॉर्टकट अपनाना सही है या फिर सिस्टम की धीमी प्रक्रिया का इंतजार करना ही एकमात्र रास्ता है।
पृथ्वीराज और करीना की अदाकारी में कितना है दम?
अभिनय के मामले में पृथ्वीराज सुकुमारन पूरी महफिल लूट ले जाते हैं। उनके चेहरे पर दिखने वाला दृढ़ विश्वास और अपनी कार्रवाई को सही ठहराने का जुनून काबिले तारीफ है। उनका किरदार ग्रे शेड लिए हुए है जो न पूरी तरह हीरो है और न विलेन, यही बात उन्हें सबसे अलग बनाती है। वहीं करीना कपूर खान ने एक गंभीर अधिकारी के रूप में अच्छा काम किया है, लेकिन कुछ दृश्यों में उनकी स्टाइलिंग फिल्म के यथार्थवादी माहौल से थोड़ी अलग नजर आती है। फिल्म में क्षिती जोग, जितेंद्र जोशी और तृप्ति खामकर जैसे कलाकारों ने भी अपने छोटे लेकिन प्रभावी किरदारों से जान फूंकी है। फिल्म का पहला हिस्सा थोड़ा धीमा जरूर लगता है क्योंकि वहां जांच की बारीकियों पर ज्यादा जोर दिया गया है, लेकिन दूसरे हाफ में कहानी रफ्तार पकड़ती है।
क्या आपको इस फिल्म पर समय खर्च करना चाहिए?
अगर आप ऐसी फिल्में पसंद करते हैं जो खत्म होने के बाद भी आपके दिमाग में सवाल छोड़ जाएं, तो इसे जरूर देखें। ‘दायरा’ कोई मसाला थ्रिलर नहीं है, बल्कि एक गंभीर ड्रामा है जो सिस्टम की खामियों को उजागर करता है। इसका क्लाइमैक्स भले ही बहुत ज्यादा हैरान न करे, लेकिन वहां तक पहुंचने का सफर काफी दिलचस्प है। यह एक मैच्योर सिनेमा है जिसे वयस्कों के लिए बनाया गया है। 3/5 स्टार की रेटिंग वाली यह फिल्म मनोरंजन के साथ-साथ नैतिकता और जिम्मेदारी पर बहस छेड़ती है। निर्देशक मेघना गुलजार ने एक बार फिर साबित किया है कि वह जटिल मानवीय भावनाओं और सामाजिक मुद्दों को पर्दे पर उतारने में माहिर हैं, भले ही इस बार कहानी की रफ्तार थोड़ी कम रही हो।
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