Prahaar Review: राजकुमार राव ने कोर्टरूम में कसाब के खिलाफ ऐसे लड़ा इंसाफ का महायुद्ध, जानें कैसी है फिल्म प्रहार

Prahaar Review: राजकुमार राव ने उज्ज्वल निकम के किरदार में फूंकी जान। जानिए 26/11 के बाद कसाब को सजा दिलाने वाली इस कानूनी लड़ाई की पूरी समीक्षा हिंदी में।

Rupali kumawat
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Rupali kumawat - Sub Editor
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Prahaar Review: मुंबई पर हुए 26/11 के उस भयानक आतंकी हमले के बाद की असली जंग सरहद पर नहीं, बल्कि अदालत के कमरा नंबर 37 में लड़ी गई थी और इसी कानूनी महायुद्ध को पर्दे पर उतारती है राजकुमार राव की नई फिल्म। यह फिल्म उस खौफनाक रात की कहानी दोहराने के बजाय इस बात पर जोर देती है कि कैसे सरकारी वकील उज्ज्वल निकम ने आतंकी अजमल कसाब को उसके अंजाम तक पहुंचाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था। राजकुमार राव ने निकम के किरदार में जिस तरह का आत्मविश्वास और ठहराव दिखाया है, वह इस पूरी कहानी की रीढ़ की हड्डी बनकर उभरता है। फिल्म की शुरुआत कसाब की गिरफ्तारी से होती है, जिसके बाद निकम के सामने न केवल एक अपराधी को सजा दिलाने की चुनौती होती है, बल्कि कसाब की उन तमाम चालों का जवाब देना भी होता है जो वह केस को भटकाने के लिए चलता है।

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क्या कसाब की चालाकियों पर भारी पड़े राजकुमार राव?

फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे कसाब कभी अपनी उम्र का बहाना बनाकर तो कभी मुंबई आने की झूठी वजह बताकर कानून की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश करता है। ललित प्रभाकर ने कसाब के रूप में एक ऐसी बेचैनी पैदा की है जो दर्शकों को पर्दे से बांधे रखती है। वहीं दूसरी तरफ राजकुमार राव ने उज्ज्वल निकम के बोलने के लहजे और अदालती दांव-पेंच को इतनी सहजता से निभाया है कि वह हर फ्रेम में असली वकील नजर आते हैं। जयदीप अहलावत भले ही छोटे रोल में दिखते हैं लेकिन उनका असर गहरा है और वामिका गब्बी ने निकम की पत्नी के रूप में उनके निजी संघर्षों को बखूबी पेश किया है। सिकंदर खेर समेत बाकी कलाकारों ने भी अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है।

कैसा है फिल्म का स्क्रीनप्ले और निर्देशन?

इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह दर्शकों को 26/11 के जख्मों को कुरेदने के बजाय न्याय मिलने की प्रक्रिया से जोड़ती है। फिल्म में निकम की निजी जिंदगी के पन्नों को भी पलटा गया है, जिससे कहानी में एक इमोशनल टच आता है। हालांकि फिल्म की रफ्तार कहीं-कहीं धीमी पड़ जाती है और पहले हिस्से में कहानी थोड़ी सुस्त लगती है। अगर स्क्रीनप्ले और बैकग्राउंड म्यूजिक में थोड़ी और धार होती, तो यह कोर्टरूम ड्रामा और भी ज्यादा प्रभावशाली बन सकता था। इसके बावजूद अगर आप सच्ची घटनाओं और कानूनी दांव-पेंच वाली फिल्में देखने के शौकीन हैं, तो राजकुमार राव की यह दमदार अदाकारी आपको निराश नहीं करेगी। यह एक गंभीर विषय को बेहद सरल तरीके से जनता के सामने रखती है।

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रुपाली कुमावत पिछले कई वर्षों से लेखन क्षेत्र में कार्यरत हैं। उनको हिंदी कविताएं, कहानियां लिखने के अलावा ब्रेकिंग, लेटेस्ट व ट्रेंडिंग न्यूज स्टोरी कवर करने में रुचि हैं। उन्होंने राजस्थान यूनिवर्सिटी से BADM में M.Com किया हैं एवं पंडित दीनदयाल शेखावाटी यूनिवर्सिटी से family law में LL.M किया हैं। रुपाली कुमावत के लेख Focus her life, (राजस्थान पत्रिका), सीकर पत्रिका, https://foucs24news.com, खबर लाइव पटना जैसे मीडिया संस्थानों में छप चुके हैं। फिलहाल रुपाली कुमावत 89.6 एफएम सीकर में बतौर न्यूज कंटेंट राइटर अपनी सेवाएं दे रही हैं।
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