Haiwaan and Ghamasaan Review: अक्षय सैफ की हैवान और अरशद की घमासान में से कौन सी फिल्म है असली पैसा वसूल मनोरंजन

Haiwaan and Ghamasaan Review: अक्षय कुमार सैफ अली खान की हैवान और अरशद वारसी की घमासान का पूरा सच और जानिए कौन सी फिल्म देगी तगड़ा मनोरंजन।

Rupali kumawat
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Rupali kumawat - Sub Editor
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Haiwaan and Ghamasaan Review: बॉलीवुड के सिनेमाघरों और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर इस बार दो बड़े मुकाबले देखने को मिल रहे हैं जहां एक तरफ बड़े शहर की ऊंची इमारत में छिपा खौफनाक सस्पेंस है तो दूसरी तरफ चंबल और बुंदेलखंड के जंगलों का खतरनाक डाकू। सैफ अली खान एक नेत्रहीन श्याम राणे के रोल में मुंबई की सोसाइटी में काम करते हैं लेकिन कहानी तब पलट जाती है जब वहां परशुराम गोखले यानी अक्षय कुमार की एंट्री होती है। अक्षय कुमार पुराने बदले की आग में जल रहे हैं और रिटायर्ड जज प्रधान यानी बोमन ईरानी की मौत के बाद सारा शक सैफ अली खान पर आ जाता है। यह सस्पेंस थ्रिलर फिल्म हैवान दर्शकों को लगातार बांधे रखती है क्योंकि इसमें एक अंधा आदमी अपनी बेगुनाही साबित करने के साथ जज की बेटी नंदनी को बचाने की जंग लड़ रहा है।

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क्या अक्षय कुमार और सैफ अली खान की टक्कर पर्दे पर आग लगा पाई?

इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी अक्षय कुमार और सैफ अली खान का आमना सामना है। सैफ अली खान ने बिना रोशनी वाली आंखों के साथ जिस तरह से अपनी लाचारी और ताकत को दिखाया है वह देखने लायक है। वहीं अक्षय कुमार का रहस्यमयी और खतरनाक अंदाज फिल्म में असली तनाव पैदा करता है। श्रिया पिलगांवकर और पहल चौधरी ने भी कहानी को आगे बढ़ाने में मदद की है। फिल्म का पहला हाफ बेहतरीन है और बैकग्राउंड म्यूजिक आपको कुर्सी से बांधकर रखता है हालांकि दूसरे हिस्से में कहानी थोड़ी धीमी हो जाती है लेकिन अगर आपको सस्पेंस से भरी कहानियां पसंद हैं तो यह फिल्म आपको निराश नहीं करेगी।

क्या डाकू बनकर अरशद वारसी दर्शकों के दिलों में खौफ पैदा करने में हुए नाकाम?

दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के घने जंगलों में छिपे डाकू महाराज यानी अरशद वारसी की फिल्म घमासान भी मैदान में है। इस डाकू को पकड़ने का जिम्मा आईपीएस आदित्य यानी प्रतीक गांधी को मिला है जो अपनी स्पेशल टास्क फोर्स के साथ चित्रकूट पहुंचता है। जब डाकू का वफादार पुलिस अफसर की पत्नी का अपहरण कर लेता है तो यह लड़ाई निजी हो जाती है और इसमें कालिका यानी राजपाल यादव भी शामिल हो जाते हैं। इस फिल्म की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जिस डाकू महाराज के नाम से खौफ पैदा होना चाहिए था वह किरदार बहुत बोरिंग लगता है और अरशद वारसी को स्क्रीन पर बहुत कम समय मिला है। प्रतीक गांधी ने बिना संवाद के भी शानदार काम किया है लेकिन कमजोर कहानी के कारण यह फिल्म न तो पूरी तरह डाकू ड्रामा बन पाती है और न ही दमदार क्राइम थ्रिलर।

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रुपाली कुमावत पिछले कई वर्षों से लेखन क्षेत्र में कार्यरत हैं। उनको हिंदी कविताएं, कहानियां लिखने के अलावा ब्रेकिंग, लेटेस्ट व ट्रेंडिंग न्यूज स्टोरी कवर करने में रुचि हैं। उन्होंने राजस्थान यूनिवर्सिटी से BADM में M.Com किया हैं एवं पंडित दीनदयाल शेखावाटी यूनिवर्सिटी से family law में LL.M किया हैं। रुपाली कुमावत के लेख Focus her life, (राजस्थान पत्रिका), सीकर पत्रिका, https://foucs24news.com, खबर लाइव पटना जैसे मीडिया संस्थानों में छप चुके हैं। फिलहाल रुपाली कुमावत 89.6 एफएम सीकर में बतौर न्यूज कंटेंट राइटर अपनी सेवाएं दे रही हैं।
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